एक रवि था खुश सा
मैं अपनी ज़िन्दगी मे बहुत खुश था! ना किसी बात की कोई समस्या थी, ना ही दिल पे कोई बात लेता था, बस! अपने तरीके से जी रहा था! अच्छा खासा कमा रहा था, उसमे से थोड़े पैसे खुद के लिए रखता बाकी अपने घर दे देता! खा पीकर मौज करता! हाँ, वैसे मैं परवाह तो किसी की नहीं करता था पर अपने माता - पिता की परवाह बहुत करता था! उनसे नाही मैंने कभी ऊँची आवाज़ मे बात की है और नाही उनका कभी अनादर किया! मेरी माताजी को मेरी काफ़ी चिंता रहती थी, वह दिन - रात यही सोचती रहती थी कि रवि का आगे क्या होगा, इसका भविष्य कैसा होगा, क्या इसको एक अच्छी पत्नी मिलेगी जो इसका ख्याल रख सकेगी या ज़िन्दगी भर मेरा रवि ऐसे ही रहेगा! दूसरी तरफ मेरे पिताजी! वे मुझे लेकर इतने गंभीर नहीं थे, वे खुद खुश रहते और मुझे भी खुश रहने देते थे! मेरी और मेरे पिताजी की इतनी बनती थी कि हमें कही भी जाना हो तो साथ मे जाते थे अगर सीधे तौर पर कहू तो, मेरे पिताजी अपनी पत्नी को घुमाने कम और मुझे घुमाने ज्यादा लेकर गये है! इसके अलावा जब मै छोटा था तब मै और पिताजी एक ही थाली मै खाना खाया करते थे, एक साथ मे सोते और हर सुबह मेरे पिताजी म...